श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत और लोकधुनों की मधुर गूंज के बीच नरेन्द्र संगीत सप्ताह का चौथा दिन गढ़वाली अस्मिता,भाषा और संस्कारों के नाम रहा। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र द्वारा आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला में क्षेत्रीय विधायक विनोद कण्डारी ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया और भावी पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का मजबूत संदेश दिया। विधायक कण्डारी ने अपने संबोधन में कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं,बल्कि संस्कारों और संस्कृति की आधारशिला है। यदि हम अपने बच्चों को मातृभाषा गढ़वाली से नहीं जोड़ेंगे,तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान खो देंगी,उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों को गढ़वाली भाषा,पारंपरिक खान-पान और वेश-भूषा से जोड़ें,ताकि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझ सकें और गर्व महसूस करें। कोदा-झंगोरा से पहचान,अब दुनिया कर रही सम्मान-कण्डारी ने पर्वतीय अंचल के पारंपरिक अनाजों-कोदा और झंगोरा का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन्हें कभी नजर अंदाज किया गया,आज वही सुपरफूड के रूप में दुनिया में पहचान बना रहे हैं। उन्होंने लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके गीतों में हमारी संस्कृति,परंपरा और जीवनशैली की सजीव झलक मिलती है। कार्यशाला के चौथे दिन लोकसंगीत का रंग और भी गहरा हो गया। मुख्य गायिका अंजलि खरे ने स्याली रामदेई और सुल्पा की साज जैसे लोकप्रिय गीतों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। देहरादून से आईं मां-बेटी की जोड़ी सरिता अणथ्वाल और अंजलि अणथ्वाल ने एक साथ मंच साझा कर दो पीढ़ियों के सांस्कृतिक जुड़ाव की सुंदर मिसाल पेश की। सरिता ने मेलु घिंघोरा तो अंजलि ने दैणा होंया खोली का गणेशा मांगल गीत गाकर खूब तालियां बटोरीं। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधा दिल्ली से मनमोहन सिंह,पाबों से नवीन कैंथोला बागेश्वर से प्रसिद्ध गीतकार मोहन चन्द्र जोशी,वैष्णवी लिंगवाल,पान सिंह नेगी,डॉ.नागेन्द्र रावत,कु.कृपा मिंज सहित कई प्रतिभागियों ने अपनी मधुर आवाज से लोकसंगीत को जीवंत कर दिया। लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र के सहायक निदेशक महेन्द्र सिंह पंवार द्वारा प्रस्तुत तीलु बाखरी गीत ने भी श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। नरेन्द्र संगीत सप्ताह केवल एक कार्यशाला नहीं,बल्कि भाषा,संस्कृति और परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त अभियान बनकर उभर रहा है। विधायक विनोद कण्डारी का संदेश साफ था यदि भाषा बची रहेगी,तो संस्कृति और संस्कार भी सुरक्षित रहेंगे।








