श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की लोकभाषाओं,लोक-संस्कृति और लोकज्ञान की समृद्ध परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पहल सामने आई है। साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ.प्रकाश चमोली द्वारा तैयार की गई पुस्तक पंचवणी कोश संग्रह का लोकार्पण आगामी 30 अगस्त 2026 को श्रीनगर गढ़वाल में किया जाएगा। हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद चैरिटेबल ट्रस्ट श्रीनगर के तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और लोकभाषा से जुड़े लोगों की मौजूदगी रहेगी। पंचवणी कोश अपने स्वरूप में इसलिए विशेष है क्योंकि इसमें गढ़वाली,कुमाऊंनी,संस्कृत,हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं से संबंधित लोकोक्तियों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है। लोकजीवन में पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रचलित कहावतें केवल भाषा की अभिव्यक्ति नहीं होती,बल्कि उनके भीतर समाज का अनुभव,जीवन-दर्शन,व्यवहार-बोध,हास्य,व्यंग्य,नीति और संस्कृति भी समाहित रहती है। ऐसे में इस लोकवाणी को पुस्तक के रूप में सहेजना उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य माना जा सकता है। पुस्तक के आत्मकथ्य में डॉ.चमोली ने स्पष्ट किया है कि समाज में प्रचलित कहावतें नीति वचन,मुहावरे,उक्ति,मसाल,किस्सा,प्रवचन और प्रोवर्ब आदि अनेक नामों से जानी जाती हैं। ये भाषा को रोचकता प्रदान करने के साथ-साथ उसे अधिक प्रभावशाली और अर्थपूर्ण बनाती हैं। सामान्य बातचीत में अनुभव से निकली किसी बात को जब समाज लंबे समय तक स्वीकार कर लेता है तो वह कहावत का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। भारतीय परंपरा में कहावतों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। वैदिक साहित्य से लेकर लौकिक संस्कृत,हिंदी साहित्य और विभिन्न भारतीय बोलियों तक इनके प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं। धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में भी सामान्य जन को गूढ़ बात सहज ढंग से समझाने के लिए लोकगाथाओं,कथाओं और कहावतों का सहारा लिया जाता रहा है। डॉ.चमोली के अनुसार कहावतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें मानव जीवन को बदलने की क्षमता निहित रहती है। आज के तनाव,खींचतान और भागदौड़ भरे दौर में भी लोकभाषा की सहज अभिव्यक्तियां मनुष्य को जीवन के अनुभवों से जोड़ने का काम कर सकती हैं। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए इस संग्रह को तैयार किया गया है। आज जब वैश्वीकरण और आधुनिक संचार माध्यमों के प्रभाव से स्थानीय बोलियों और पारंपरिक शब्दावली के सामने संरक्षण की चुनौती बढ़ रही है,ऐसे समय में पंचवणी कोश संग्रह जैसे प्रयासों का महत्व और बढ़ जाता है। गढ़वाली और कुमाऊंनी जैसी उत्तराखंड की लोकभाषाओं में सदियों से संचित लोकज्ञान को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करना आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। पुस्तक केवल कहावतों का संग्रह भर नहीं है,बल्कि इसके माध्यम से लोकभाषा में छिपे सामाजिक अनुभव और सांस्कृतिक चेतना को सामने लाने का प्रयास किया गया है। पांच भाषाओं को एक साथ जोड़ने वाला यह संकलन भाषा-अध्ययन,साहित्य और लोक-संस्कृति के शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी सामग्री उपलब्ध करा सकता है। पुस्तक के लेखक डॉ.प्रकाश चमोली का साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय योगदान रहा है। पुस्तक में उपलब्ध परिचय के अनुसार उनका जन्म 3 मार्च 1971 को ग्राम मरसगांव पोस्ट ऑफिस काण्डई जनपद रुद्रप्रयाग में हुआ। उन्होंने हिंदी एवं संस्कृत में एमए साहित्य में आचार्य,बीएड तथा विशिष्ट बीटीसी,पीएचडी और धर्मोपदेशक जैसी शैक्षिक योग्यताएं अर्जित की हैं। उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय,सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में अध्ययन किया है। उनके साहित्यिक एवं शैक्षिक कार्यों के लिए उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। पुस्तक में कालिदास पुरस्कार 2005 सहित अनेक सम्मानों का उल्लेख है। डॉ.चमोली राष्ट्रीय कार्यशालाओं में प्रतिभागिता एवं शोधपत्र वाचन के साथ-साथ साहित्यिक गोष्ठियों में भी सक्रिय रहे हैं। पौड़ी,देहरादून,बद्रीनाथ सहित विभिन्न स्थानों पर आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों और कवि सम्मेलनों में उनकी सहभागिता रही है। वे हिमालय साहित्य एवं कला परिषद के संस्थापक सदस्य भी हैं। 30 अगस्त को श्रीनगर में जुटेगा साहित्यिक समाज हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद चैरिटेबल ट्रस्ट श्रीनगर की ओर से जारी आमंत्रण के अनुसार पंचवणी कोश संग्रह का लोकार्पण 30 अगस्त 2026 को प्रातः 10.30 बजे सराफ धर्मशाला गढ़वाल में आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम में साहित्यकारों,शिक्षाविदों,संस्कृति प्रेमियों,लोकभाषा से जुड़े लोगों और नगर के गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रहेगी। आयोजकों की ओर से कार्यक्रम में साहित्य एवं संस्कृति प्रेमियों से सहभागिता की अपील की गई है। पंचवणी कोश-लोकवाणी से लोकविरासत तक उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय,नदियों और धार्मिक धरोहर से ही नहीं,बल्कि यहां की जीवंत लोकभाषाओं,लोकगीतों,लोककथाओं और लोकवाणी से भी है। गांव-गांव में बुजुर्गों की जुबान पर रही अनेक कहावतें और लोकोक्तियां आधुनिक पीढ़ी के बीच धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। ऐसे दौर में पंचवणी कोश संग्रह लोकवाणी को पुस्तक के पन्नों में सुरक्षित करने का एक सार्थक प्रयास है। यह संग्रह आने वाले समय में यह याद दिलाएगा कि लोकभाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं,बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति और पीढ़ियों के अनुभवों की जीवित धरोहर हैं। डॉ.प्रकाश चमोली की यह पहल उत्तराखंड की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को संजोने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम के रूप में देखी जा रही है।








