आज सबसे बड़ा सवाल है—हम भगवान श्रीराम का नाम तो लेते हैं, लेकिन क्या उनके आदर्शों को अपने जीवन और अपने शासन में अपनाते है
भगवान श्रीराम के रामराज्य की परिकल्पना एक ऐसे समाज की थी, जहाँ किसी के साथ अन्याय न हो, गरीब की आवाज सुनी जाए, महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित हो, किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले और नौजवान को रोजगार के लिए दर-दर भटकना न पड़े।
जहाँ सत्ता अहंकार का नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम हो। जहाँ धर्म का अर्थ नफरत नहीं, बल्कि करुणा हो; जहाँ राजनीति का उद्देश्य केवल कुर्सी प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनता के जीवन में खुशहाली लाना हो।
यही रामराज्य की आत्मा है—न्याय सबके लिए, सम्मान सबके लिए और अवसर सबके लिए!
भगवान श्रीराम ने हमें सिखाया कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने राजसिंहासन से अधिक अपने कर्तव्य और मर्यादा को महत्व दिया।
आज जब हम देश और उत्तराखंड के विकास की बात करते हैं, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए—क्या हमारे किसान खुशहाल हैं? क्या हमारे युवाओं को पर्याप्त रोजगार मिल रहा है? क्या गरीब को समय पर न्याय मिल रहा है? क्या हमारी बेटियाँ पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती हैं?
रामराज्य केवल भाषणों में नहीं, बल्कि जनता के जीवन में दिखाई देना चाहिए। जब गरीब के घर में खुशहाली हो, जब किसी के साथ जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव न हो, जब ईमानदारी का सम्मान हो और जब अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुँचे—तभी रामराज्य का सपना साकार होगा।
आइए, आज हम संकल्प लें कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को केवल मंदिरों और मंचों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि अपने आचरण, समाज और जनसेवा में भी उतारेंगे। इससे पूर्व रामलीला कमेटी के अध्यक्ष गौरव आर्य, लियाकत राजू श्रीवास्तव व महेश यादव सहित अनेक लोगों ने फूल माला से स्वागत किया।