कीर्तिनगर/श्रीनगर गढ़वाल। विकास खण्ड कीर्तिनगर के रानीहाट (ब्राह्मण गांव) में जोशी परिवार की ओर से अपने दिवंगत पितृजनों की मोक्ष कामना एवं आत्मिक शांति के लिए आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा इन दिनों क्षेत्र में धार्मिक आस्था,आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक सरोकारों का केंद्र बनी हुई है। क्षेत्र पंचायत सदस्य मनोज जोशी के आवास पर आयोजित कथा में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर व्यासपीठ से भगवान श्रीहरि की कथा का श्रवण कर रहे हैं। मंगलवार को कथा व्यासपीठ पर विराजमान कथावाचक आचार्य नरेश बंदूनी ने श्रीमद्भागवत कथा के आध्यात्मिक प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म के वास्तविक स्वरूप का संदेश देते हुए कहा कि भारत भूमि देवी-देवताओं,ऋषि-मुनियों और संतों की पावन तपस्थली रही है। उत्तराखंड इस आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। भगवान शिव की तपस्थली से लेकर मां गंगा के अवतरण तक उत्तराखंड की धरती का भारतीय संस्कृति में विशिष्ट स्थान रहा है। मां गंगा की पावन धारा ने सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ करोड़ों लोगों के जीवन को सींचा है। आचार्य बंदूनी ने कहा कि देवभूमि को केवल नाम से देवभूमि कहना पर्याप्त नहीं है,बल्कि इसकी पवित्रता,संस्कृति,प्रकृति और मानवीय मूल्यों को बचाए रखना भी हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड को पाप और पाखंड से मुक्त रखने का संकल्प तभी सार्थक होगा,जब समाज में बड़ों के प्रति आदर,छोटों के प्रति स्नेह,मानवता के प्रति विश्वास तथा प्रत्येक जीव के प्रति करुणा का भाव मजबूत होगा। उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को बेहतर इंसान बनाना है। यदि पूजा-पाठ के बाद भी मनुष्य के भीतर अहंकार,द्वेष,हिंसा,छल-कपट और प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता बनी रहती है तो धर्म की मूल भावना अधूरी रह जाती है। मानव सेवा,जीव-जंतुओं की रक्षा,पशु-पक्षियों के प्रति संवेदना और पर्यावरण संरक्षण भी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि आज प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव और पर्यावरण के प्रति घटती संवेदनशीलता चिंता का विषय है। देवभूमि की नदियों,जंगलों,जलस्रोतों,पशु-पक्षियों और प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ,सुरक्षित और संस्कारित उत्तराखंड देना तभी संभव है,जब वर्तमान पीढ़ी अपनी जिम्मेदारियों को समझे। जोशी परिवार की ओर से यह श्रीमद्भागवत महापुराण कथा अपने दिवंगत पितृजनों परलोकवासी स्व.भुवनेश्वर प्रसाद जोशी,माता दर्शनी देवी एवं समस्त पितृजनों की मोक्ष कामना एवं आत्मिक शांति के उद्देश्य से आयोजित की जा रही है। श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण मनुष्य को आध्यात्मिक शांति प्रदान करने के साथ ही जीवन में सदाचार,भक्ति और सत्कर्मों की प्रेरणा देता है। कथा आयोजन में परिवार के अनुसूया प्रसाद जोशी,राजेंद्र प्रसाद जोशी,महेंद्र प्रसाद जोशी,उपेंद्र प्रसाद जोशी,हर्षदेव जोशी सहित विकास,अरुण,सुबोध,सुधीर,विवेक,अमित,राहुल,अजय,प्रद्युमन,शौर्य जोशी सहित परिवार के अन्य सदस्य श्रद्धापूर्वक सहयोग कर रहे हैं। परिवार के कुलपुरोहित भगवती प्रसाद जोशी धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। कथा स्थल पर भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है। श्रद्धालु कथा के विभिन्न प्रसंगों को एकाग्रता से सुनते हुए भगवान श्रीहरि के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं। कथा के दौरान भजन-कीर्तन और धार्मिक वातावरण से पूरा क्षेत्र भक्तिमय बना हुआ है। आचार्य नरेश बंदूनी ने अंत में श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि भागवत कथा के संदेश को केवल कथा पंडाल तक सीमित न रखें,बल्कि उसे अपने जीवन और व्यवहार में उतारें। यही सच्ची भक्ति,यही धर्म और यही देवभूमि के प्रति हमारी वास्तविक सेवा होगी। कथा आयोजन ने जहां जोशी परिवार की पितृभक्ति और धार्मिक आस्था को नई अभिव्यक्ति दी है,वहीं क्षेत्रवासियों के बीच मानवता,सामाजिक सद्भाव,संस्कार,पर्यावरण संरक्षण और देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का संदेश भी प्रभावी ढंग से पहुंचाया है।







