पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की हरी-भरी वादियों में प्रकृति संरक्षण की परंपरा को जनजीवन और संस्कारों से जोड़ने की एक अनूठी पहल लगातार नई मिसाल पेश कर रही है। विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर पौधारोपण कर खुशियों को प्रकृति के नाम समर्पित करने की यह परंपरा अब केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि सामाजिक जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण का सशक्त माध्यम बनती जा रही है। इसी कड़ी में जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड थलीसैंण अंतर्गत पट्टी कण्डारस्यूं के ग्राम पैलार में एक विवाह समारोह के दौरान वर-वधू ने अमरूद का समलौण पौधा रोपकर पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन का प्रेरणादायी संदेश दिया। ग्राम पैलार निवासी धन सिंह गुसाईं एवं रामेश्वरी देवी गुसाईं की पुत्री के विवाह के अवसर पर वर देवेंद्र और वधू प्रीति ने घर के आंगन में अमरूद का पौधा रोपा। इस पहल के माध्यम से नवदंपती ने अपने वैवाहिक जीवन की नई शुरुआत को प्रकृति के साथ जोड़ते हुए विवाह की मधुर स्मृतियों को सहेजने का अनूठा प्रयास किया। यह पौधा आने वाले वर्षों में उनके नए जीवन की शुरुआत,पारिवारिक खुशियों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का जीवंत प्रतीक बनेगा। पौधे के संरक्षण एवं देखभाल की जिम्मेदारी दुल्हन की माता रामेश्वरी देवी ने ली। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि पौधारोपण की सार्थकता केवल पौधा लगाने तक सीमित नहीं है,बल्कि उसे सुरक्षित रखकर वृक्ष बनने तक उसकी देखभाल करना भी उतना ही आवश्यक है। कार्यक्रम का संचालन गांव की समलौण सेना की नायिका सतेश्वरी देवी गुसाईं ने किया। उन्होंने कहा कि बेटी की विदाई जैसे भावुक और यादगार अवसर पर वर-वधू के हाथों पौधारोपण कराना एक सुखद पहल है। विवाह समारोह में लगाया गया यह पौधा गांव के ग्रामीणों,बारातियों और घरातियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। उन्होंने कहा कि समलौण पौधारोपण अब गांव में एक परंपरा का रूप ले चुका है। जब भी गांव में विवाह सहित अन्य संस्कारों से जुड़े मांगलिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं,तो पौधारोपण के माध्यम से उन खुशियों को प्रकृति के साथ जोड़ा जाता है। इससे मानव और प्रकृति के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होता है तथा नई पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा मिलती है। सतेश्वरी देवी ने कहा कि समलौण पौधे केवल पेड़ नहीं हैं,बल्कि वे परिवारों की यादों,रिश्तों और संस्कारों को भी अपने भीतर संजोए रखते हैं। आज गांव के अनेक घरों में पहले लगाए गए समलौण पौधे वृक्ष बन चुके हैं। इनसे लोगों को फल,छाया और हरियाली मिलने के साथ-साथ स्वच्छ एवं सुंदर वातावरण का अनुभव होता है। जब परिवार के सदस्य इन वृक्षों को देखते हैं,तो उन्हें उस विशेष अवसर और उससे जुड़ी भावनाओं की याद भी ताजा हो जाती है। इस अवसर पर समलौण आंदोलन के राज्य संयोजक मातबर सिंह बर्त्वाल ने कहा कि समलौण पौधारोपण की पहल आज जनभागीदारी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन का एक प्रभावी माध्यम बन रही है। इस अभियान की विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति संरक्षण को किसी एक दिन के आयोजन तक सीमित रखने के बजाय जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों और सामाजिक परंपराओं से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। वनों का संरक्षण,अधिक से अधिक पौधारोपण तथा वन्यजीवों की सुरक्षा आज समय की आवश्यकता है। उन्होंने क्षेत्रवासियों से वनों को आग और अवैध कटान से बचाने,प्राकृतिक संपदा की रक्षा करने तथा वन्यजीवों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। समारोह के दौरान वर देवेंद्र ने समलौण सेना की ओर से किए जा रहे इस पुनीत कार्य की सराहना करते हुए टीम को 500 रुपये की नकद राशि भेंट की। यह सम्मान पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित महिलाओं के उत्साहवर्धन और सामाजिक कार्यों में सहयोग की भावना का प्रतीक रहा। कार्यक्रम में समलौण सेना की सदस्य सुमित्रा देवी,मधु देवी,नीमा देवी,बीमा देवी सहित परिवार के सदस्य,ग्रामीण,घराती एवं बाराती उपस्थित रहे। ग्राम पैलार में आयोजित यह पहल संदेश देती है कि विवाह की खुशियों को केवल उत्सव तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रकृति के संरक्षण से जोड़कर आने वाली पीढ़ियों के लिए यादगार बनाया जा सकता है। यदि प्रत्येक परिवार अपने मांगलिक अवसरों पर एक पौधा लगाकर उसके संरक्षण का संकल्प ले,तो गांवों की हरियाली बढ़ाने के साथ पर्यावरण के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी मजबूत हो सकती है। समलौण पौधारोपण की यह परंपरा सचमुच एक ऐसी अनमोल विरासत है,जिसमें रिश्तों की मिठास,संस्कारों की खुशबू और प्रकृति के प्रति कर्तव्यबोध एक साथ दिखाई देते हैं।