पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ की संस्कृति में प्रकृति केवल जीवन का आधार नहीं,बल्कि आस्था,संस्कार और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रही है। इसी भाव को आत्मसात करते हुए विकासखंड कल्जीखाल के पट्टी मनियारस्यूं स्थित ग्राम डांगी में चौहान परिवार ने अपनी माता स्व.कलावती देवी की प्रथम पुण्यतिथि को पर्यावरण संरक्षण और पितृ-स्मरण का अनूठा अवसर बना दिया। परिवार की ओर से पंचायत भवन परिसर एवं मां भुवनेश्वरी मंदिर परिसर में माल्टा,आंवला तथा छायादार समलौण पौधे रोपित किए गए। पौधारोपण के दौरान चौहान परिवार के सदस्यों ने अपनी माता एवं समस्त पितृजनों की पुण्य आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए प्रकृति संरक्षण का संकल्प लिया। इस अवसर पर वातावरण श्रद्धा,संस्कार और पर्यावरण चेतना से सराबोर रहा। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल स्मरण करने से नहीं,बल्कि उनके नाम पर आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवनदायी विरासत तैयार करने से भी दी जा सकती है। समलौण पौधारोपण कार्यक्रम में राजेंद्र सिंह चौहान,उनके भाई गोपाल सिंह चौहान एवं बड़ी बहन सुनीता काठेठ ने सहभागिता की। राजेंद्र सिंह चौहान वर्तमान में लोकसभा सचिवालय भारत सरकार नई दिल्ली में सुरक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। राजेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि समलौण केवल पौधा लगाने तक सीमित कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं,बल्कि यह भावनाओं,संस्कारों और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा एक सार्थक आंदोलन है। उन्होंने कहा कि अपने प्रियजनों की स्मृति में पौधा लगाकर हम एक ओर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं,वहीं दूसरी ओर धरती मां की सेवा का संकल्प भी लेते हैं। उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि जन्म,विवाह,पुण्यतिथि और अन्य संस्कारों के अवसर पर पौधारोपण को सामाजिक परंपरा का हिस्सा बनाया जाए तो आने वाले समय में इसका व्यापक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। जब पेड़ बचेंगे तभी पानी बचेगा और जब पानी बचेगा तभी जीवन सुरक्षित रहेगा। उन्होंने समलौण आंदोलन की सराहना करते हुए कहा कि इस पहल ने पर्यावरण संरक्षण को भावनात्मक रूप से लोगों से जोड़ने का सुंदर कार्य किया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक परिवार इसे अपने जीवन और संस्कारों का हिस्सा बनाए। पौधों के संरक्षण की जिम्मेदारी भी तय
कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि चौहान परिवार ने केवल पौधे रोपकर अपनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं की,बल्कि उनकी देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी भी तय की। परिवार के नाती दिनेश चौहान ने रोपित पौधों के संरक्षण का संकल्प लिया। समलौण की मूल भावना भी यही है कि पौधा लगाना जितना जरूरी है,उससे कहीं अधिक जरूरी उसका संरक्षण और पालन-पोषण करना है। पौधे के साथ भावनात्मक रिश्ता जोड़कर ही उसे वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखा जा सकता है। धर्म,संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संगम
पौधारोपण कार्यक्रम का संचालन समलौण आंदोलन के जिला मीडिया संयोजक जगमोहन डांगी ने किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान सदियों पुराना है। यहां जल,जंगल और जमीन को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन और आस्था का आधार माना गया है। उन्होंने कहा कि समलौण आंदोलन इसी पारंपरिक सोच को आधुनिक पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास है। संस्कारों के अवसर पर पौधारोपण की परंपरा विकसित होने से पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी अभियान न रहकर समाज की अपनी जिम्मेदारी बन सकता है। ग्राम डांगी में आयोजित यह पहल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी विशेष रही। मां भुवनेश्वरी मंदिर परिसर में पौधारोपण ने प्रकृति,आस्था और संस्कारों के बीच उस गहरे संबंध को सामने रखा,जिसे उत्तराखंड की लोक परंपरा सदियों से संजोती आई है। पितरों की याद में पेड़,धरती के लिए जीवन का संदेश-चौहान परिवार की इस पहल ने समाज को एक सरल लेकिन अत्यंत गहरा संदेश दिया है-जो लोग हमें जीवन देकर इस संसार से विदा हो गए,उनकी स्मृति में ऐसा जीवन रोपित किया जाए जो आने वाली पीढ़ियों को जीवन देता रहे। पहाड़ में पेड़ का अर्थ पानी है,पानी का अर्थ जीवन है और जीवन का आधार प्रकृति है। ऐसे में पितृजनों की पुण्यतिथि पर पौधारोपण करना केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं,बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बन जाता है। स्व.कलावती देवी की प्रथम पुण्यतिथि पर चौहान परिवार द्वारा की गई यह पहल वास्तव में पितरों को श्रद्धांजलि,धरती मां की सेवा और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित विरासत तैयार करने का सुंदर संगम है। समलौण की यह भावना यदि गांव-गांव और परिवार-परिवार तक पहुंचे तो उत्तराखंड की पहाड़ियों को फिर से हरा-भरा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। संदेश स्पष्ट है-एक पौधा लगाइए,उसकी रक्षा कीजिए और एक जीवन बचाइए।








