श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय संस्कृति की आत्मा पर्वों एवं उत्सवों में रची-बसी है। इन्हीं पर्व-उत्सवों के माध्यम से समाज अपने संस्कारों,लोक-परम्पराओं और जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर आगे बढ़ाता है। समय साक्ष्य द्वारा प्रकाशित डॉ.कमल किशोर डुकलान सरल की पुस्तक भारतीय पर्व एवं उत्सव-एकता एवं सद्भावना के प्रतीक इसी सांस्कृतिक चेतना की एक सारगर्भित,विचारोत्तेजक और मूल्यपरक कृति है। यह पुस्तक केवल पर्वों और उत्सवों का विवरण नहीं देती,बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि,सामाजिक समरसता,लोक-संस्कृति,प्रकृति-चेतना और राष्ट्रीय भावना का समग्र चित्र प्रस्तुत करती है। लेखक ने इस कृति को अपने स्व.पिता सुबेदार गोविन्द राम डुकलान को समर्पित कर पितृभक्ति और भारतीय संस्कार परम्परा का भावपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया है। डॉ.डुकलान सरल ने इस पुस्तक में यह भी स्पष्ट किया है,कि परम्पराएं रूढ़िवादिता का प्रतीक नहीं होती,बल्कि पीढ़ियों के अनुभवों की संचित निधि होती हैं। भारतीय पर्व एवं उत्सव केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं,बल्कि समाज को जोड़ने वाले,संस्कृति को सहेजने वाली प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने का जीवनोत्सव हैं। इसी कारण है कि ये पर्व भारतीय संस्कृति को कालजयी बनाते हैं। पुस्तक के आलेखों का आरम्भ सावन मास में भगवान शिव को समर्पित कांवड़ यात्रा से होता है,जिसमें लेखक ने भारत की प्राचीन शैव परम्परा के उद्गम और उसकी लोक-आस्था को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। इसके बाद रक्षाबंधन जैसे भावनात्मक पर्व के माध्यम से पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द को सशक्त रूप में उकेरा गया है। विश्वकर्मा दिवस पर आधारित आलेख भारतीय शिल्प,स्थापत्य और कर्म-संस्कृति का सम्मान करता है,वहीं हरेला पर्व प्रकृति को मातृस्वरूप मानते हुए पर्यावरण संरक्षण की चेतना को जाग्रत करता है। गुरु पूर्णिमा भारतीय ज्ञान परम्परा में गुरु की महत्ता को रेखांकित करती है,जबकि विश्व योग दिवस पर केन्द्रित आलेख योग की वैश्विक प्रासंगिकता को सार्थक रूप से सामने लाता है। उत्तराखंड के लोकपर्वों पर लेखक की दृष्टि विशेष रूप से प्रशंसनीय है। फूलदेई को उन्होंने केवल बसन्तोत्सव नहीं,बल्कि भारतीय हिन्दू नववर्ष के शुभ स्वागत का सांस्कृतिक पर्व बताया है। इगास जैसे विशिष्ट दीपपर्व के माध्यम से उत्तराखंड के वीर इतिहास विशेषत-चीन सीमा निर्धारण से जुड़े महान योद्धा माधो सिंह भंडारी की स्मृति को सम्मानपूर्वक जीवंत किया गया है। घी संक्रान्ति जैसे पशुधन आधारित लोकपर्व के माध्यम से लेखक ने गोपाल संस्कृति और ग्रामीण समृद्धि के भाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। इस कृति में कुल तैंतालीस आलेख संकलित हैं,जिनमें पर्व एवं उत्सवों के साथ-साथ महान विभूतियों पर आधारित आलेख भी शामिल हैं। हनुमान जी की अष्ट सिद्धियां,छत्रपति शिवाजी महाराज और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे राष्ट्रनायकों पर केन्द्रित आलेख पुस्तक को वैचारिक गहराई और राष्ट्रीय चेतना प्रदान करते हैं। लेखक ने संस्कृत को सनातन संस्कृति की आत्मा बताते हुए सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान और भाषाई समरसता का संदेश दिया है। भारतीय भाषाओं की शब्द-संपदा,भाव-वैभव और सांस्कृतिक संस्कारों पर आधारित उनके आलेख इस कृति को और अधिक समृद्ध बनाते हैं। उत्तराखंड राज्य स्थापना की रजत जयंती के अवसर पर लेखक द्वारा लिखा गया आलेख विकास के पैमाने पर 25 वर्षों में उत्तराखंड कितना बढ़ा,राज्य की विकास यात्रा का संतुलित तथ्यपरक और विवेकपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करता है। डॉ.कमल किशोर डुकलान सरल केवल शब्दों के शिल्पकार नहीं,बल्कि संवेदनशील चिंतक और सहृदय लेखक हैं। उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण,भावात्मक और पाठक को भीतर तक स्पर्श करने वाली है। यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों को भारतीय पर्व-उत्सवों के सांस्कृतिक,सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व से जोड़ने में सफल सिद्ध होती है। भारतीय पर्व एवं उत्सव-एकता एवं सद्भावना के प्रतीक एक ऐसी कृति है,जो न केवल पढ़ी जानी चाहिए,बल्कि सहेज कर रखे जाने योग्य है। लेखक को इस उत्कृष्ट,सारगर्भित और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कृति के लिए डॉ.कमल किशोर डुकलान ‘सरल’ को पुस्तक के सफल प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई एवं मंगलमयी अनन्त शुभकामनाएं।








