देहरादून/श्रीनगर गढ़वाल। अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की संस्तुति को लेकर अब एक नया विवाद सामने आ गया है। पर्यावरणविद अनिल जोशी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के आधार पर सीबीआई जांच की अनुशंसा किए जाने पर विभिन्न सामाजिक संगठनों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राजधानी देहरादून स्थित प्रेस क्लब में आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता में संगठनों ने इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक एवं प्रशासनिक संरक्षण की आशंका जताई। मूल निवास संघर्ष समिति के संयोजक लूशून टोडरिया ने कहा कि यह अत्यंत हैरान करने वाला है कि उत्तराखंड सरकार ने अंकिता के माता-पिता द्वारा लिखे गए पत्र को नजर अंदाज किया,जबकि दो वर्षों तक चुप रहे अनिल जोशी की एफआईआर का संज्ञान लेकर सीबीआई जांच की संस्तुति दे दी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतने लंबे समय बाद अनिल जोशी को इस जघन्य अपराध की गंभीरता का एहसास हुआ। राष्ट्रीय रीजनल पार्टी की अध्यक्ष सुलोचना इस्टवाल ने कहा कि धराली आपदा,जोशीमठ संकट और देवदार के पेड़ों की कटान जैसे उत्तराखंड के ज्वलंत पर्यावरणीय मुद्दों पर अनिल जोशी की चुप्पी उन्हें लगातार संदेह के घेरे में लाती रही है। ऐसे व्यक्ति का अचानक इस प्रकरण में मुख्य भूमिका में आना कई प्रश्न खड़े करता है। मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के राकेश नेगी ने कहा कि अंकिता हत्याकांड प्रथम दृष्टया एक ऐसा गंभीर अपराध है,जो राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के साए में घटित हुआ प्रतीत होता है। अब तक की जांच प्रक्रिया और की गई कार्यवाही कई ऐसे सवाल छोड़ती है,जिनका जवाब सरकार और जांच एजेंसियों को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए। उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के प्रमोद काला ने कहा कि सामान्यतः सीबीआई जांच पूरे प्रकरण की होती है, लेकिन इस मामले में जांच को केवल वायरल ऑडियो तक सीमित कर दिया गया है,जो न्याय की भावना के विपरीत है और इससे सच्चाई सामने आने की संभावनाएं कमजोर होती हैं। पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल ने कहा कि यह तथ्य सामने आया है कि अनिल जोशी हेस्को से जुड़े रहे हैं और सरकार के कई कार्यों में उनकी भूमिका रही है। ऐसे में उनका इस प्रकरण में मुख्य पैरोकार बनना जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और पूरे मामले को प्रभावित कर सकता है। उत्तराखंड क्रांति सेना के ललित श्रीवास्तव ने सवाल उठाया कि जब अंकिता के माता-पिता द्वारा पहले ही शिकायत दर्ज कराई जा चुकी थी,तो उसी शिकायत के आधार पर सीबीआई जांच क्यों नहीं कराई गई। नई एफआईआर दर्ज कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी,यह भी एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है। आकांक्षा नेगी ने कहा कि पूरे घटनाक्रम में बार-बार यह सामने आ रहा है कि सत्ताधारी भाजपा से जुड़े नेता किसी न किसी रूप में वीआईपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री स्वयं पौड़ी जाकर पीड़ित परिवार से मिल सकते थे,तो फिर परिवार को अपने आवास पर बुलाकर गोपनीय बैठक क्यों की गई। पीड़ित परिवार स्वयं कह चुका है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की थी,लेकिन इसके विपरीत अनिल जोशी की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई,जबकि यही एफआईआर अंकिता के माता-पिता को मुख्य पैरोकार बनाकर भी की जा सकती थी। प्रेस वार्ता में अधिवक्ता संदीप चमोली,पौड़ी बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक नमन चंदोला,स्वाभिमान मोर्चा के अनिल डोभाल,जय संविधान संगठन के विकास कुमार उत्तराखंडी,नवनीत कुकरेती,कीर्ति बिष्ट सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता एवं संगठन प्रतिनिधि उपस्थित रहे।








