पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। नयार घाटी की वादियों में आयोजित नयार वैली एडवेंचर फेस्टिवल की दूसरी सांस्कृतिक संध्या लोक-संस्कृति और पारंपरिक संगीत की अविस्मरणीय शाम बन गई। जैसे ही मंच पर उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध जागर गायक प्रीतम भरतवाण ने कदम रखा,पूरा पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। रुमा झूमा जागर की पहली स्वर लहरियों के साथ ही माहौल आध्यात्मिक और लोकभावना से सराबोर हो गया। ढोल-दमाऊ की थाप और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज ने न केवल पांडाल में बैठे दर्शकों को झूमने पर मजबूर किया,बल्कि पूरी नयार घाटी में लोकसंगीत की मधुर प्रतिध्वनि फैल गई। इसके बाद उन्होंने मेरु हिमवंती देश,सरुली मेरु जिया लगी गे,सभी कठ्ठा ह्वे गैनी और बिंदुली राति रै गे जरासी जैसे अपने लोकप्रिय गीतों की शानदार प्रस्तुतियां दीं। हर गीत के साथ दर्शकों का उत्साह चरम पर पहुंचता गया। लोग अपनी सीटों पर बैठे-बैठे थिरकते नजर आए,तो कई दर्शक भावनाओं में डूबकर लोकधुनों का आनंद लेते रहे। पांडाल खचाखच भरा रहा और युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग के लोगों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि लोक-संस्कृति आज भी जनमानस की धड़कन है। मंच पर सजी पारंपरिक वेशभूषा,सजीव वादन और लोकगायन की अनुपम प्रस्तुति ने आयोजन को सांस्कृतिक वैभव का उत्सव बना दिया। यह संध्या केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भर नहीं थी,बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपरा,देवभूमि की आध्यात्मिक विरासत और नयार घाटी की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रदर्शन थी। नयार वैली एडवेंचर फेस्टिवल ने जहां साहसिक गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को आकर्षित किया, वहीं ऐसी लोकसंध्या ने प्रदेश की जड़ों से जुड़े सांस्कृतिक गौरव को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। यह शाम नयार घाटी के इतिहास में एक यादगार अध्याय के रूप में दर्ज हो गई-जब लोकधुनों ने पर्वतीय अंचल की आत्मा को फिर से जीवंत कर दिया।








