मसूरी में वंदे मातरम के 150 गौरवशाली वर्ष पर गूंजा राष्ट्रभक्ति का स्वरमसूरी, में वंदे मातरम के 150 गौरवशाली वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर शुक्रवार को महात्मा योगेश्वर सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज मसूरी में सामूहिक वंदे मातरम गायन कार्यक्रम आयोजित किया गया। विद्यालय परिसर में छात्र-छात्राओं और अतिथियों ने सामूहिक रूप से वंदे मातरम का गायन कर मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्रभावना का संदेश दिया। कार्यक्रम का आयोजन विद्या भारती उत्तराखंड के तत्वावधान में किया गया।कार्यक्रम में रिटायर्ड कर्नल अनिल कुमार, निधि बहुगुणा और मनोज रायल ने वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रचेतना से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर है। वंदे मातरम ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लोगों में देशप्रेम और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वक्ताओं ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत देशवासियों के बीच राष्ट्रभावना का प्रमुख स्वर बना। वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसका गायन किया था। इसके बाद वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों में जनजागरण का महत्वपूर्ण माध्यम बना।रिटायर्ड कर्नल अनिल कुमार ने कहा कि सैनिकों के लिए मातृभूमि सर्वाेच्च होती है और वंदे मातरम शब्दों में इसी भावना की अनुभूति होती है। उन्होंने विद्यार्थियों से देश की एकता, अखंडता और संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया।निधि बहुगुणा ने कहा कि नई पीढ़ी को देश के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतीकों की जानकारी होना जरूरी है। वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ विद्यार्थियों को राष्ट्र और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर है। मनोज रायल ने कहा कि विद्यालयों में इस तरह के आयोजन बच्चों में राष्ट्रप्रेम और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करते हैं। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम की भावना केवल कार्यक्रम तक सीमित न रहकर दैनिक जीवन में भी दिखाई देनी चाहिए।