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श्रीनगर की हवा बहुत खराब श्रेणी में-जंगलों की आग और काले कार्बन ने बढ़ाया खतरा,वैज्ञानिकों ने जारी किया चेतावनी बुलेटिन

gvartanews by gvartanews
May 1, 2026
Reading Time: 1 min read
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श्रीनगर गढ़वाल। पर्वतीय क्षेत्रों की स्वच्छ वादियों के लिए पहचाना जाने वाला श्रीनगर इन दिनों गंभीर वायु प्रदूषण की चपेट में है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग स्थित हिमालयी वातावरणीय एवं अंतरिक्ष भौतिकी शोध प्रयोगशाला द्वारा जारी वायु गुणवत्ता का द्वितीय बुलेटिन क्षेत्र की चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है। डॉ.आलोक सागर गौतम के नेतृत्व में शोध टीम अमनदीप विश्वकर्मा,अंकित कुमार और सरस्वती रावत द्वारा 30 अप्रैल 2026 को चौरास परिसर में जारी इस बुलेटिन के अनुसार श्रीनगर में वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार खराब से बहुत खराब श्रेणी में बना हुआ है,जो आमजन के स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। 18 अप्रैल से 29 अप्रैल 2026 के बीच दर्ज आंकड़ों के अनुसार वायु गुणवत्ता सूचकांक 275 से 336 के बीच रहा। 18 से 23 अप्रैल के दौरान इसमें तेजी से वृद्धि दर्ज की गई,जबकि इसके बाद कई दिनों तक यह उच्च स्तर पर स्थिर बना रहा। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रदूषण केवल बढ़ ही नहीं रहा,बल्कि लगातार बना भी हुआ है। भारत में वायु गुणवत्ता का आकलन राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों के अंतर्गत किया जाता है,जिसमें सूक्ष्म कण (पीएम 2.5 और पीएम 10),सल्फर डाइऑक्साइड,नाइट्रोजन डाइऑक्साइड,ओजोन,कार्बन मोनोऑक्साइड और अमोनिया जैसे प्रदूषकों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक आधार पर मापा जाता है। इन्हीं के आधार पर वायु गुणवत्ता सूचकांक निर्धारित किया जाता है,जिसे छह श्रेणियों-अच्छा,संतोषजनक,मध्यम,खराब,बहुत खराब और गंभीर-में विभाजित किया गया है। शोध में यह स्पष्ट हुआ है कि क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण का मुख्य कारण जंगलों में लग रही आग,स्थानीय स्तर पर दहन गतिविधियां और काले कार्बन का अत्यधिक उत्सर्जन है। 18 से 23 अप्रैल के बीच काले कार्बन की मात्रा में तीव्र वृद्धि देखी गई,जो 23 अप्रैल को अत्यधिक स्तर तक पहुंच गई। इसी अवधि में जैविक पदार्थों के जलने का योगदान भी 55 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 72 प्रतिशत तक पहुंच गया। 24 से 29 अप्रैल के बीच यह प्रतिशत 63 से 77 के बीच बना रहा,जिससे यह स्पष्ट होता है कि जंगलों की आग और अन्य दहन गतिविधियां प्रदूषण की प्रमुख वजह बनी हुई हैं। मौसमीय विश्लेषण से पता चलता है कि 24 से 27 अप्रैल के बीच तापमान अधिक और नमी कम रहने से वातावरण शुष्क बना रहा,जिससे प्रदूषक कणों का जमाव बढ़ा। वहीं हवा की गति भी सामान्यतः कम रही,जिससे प्रदूषण फैलने के बजाय एक ही स्थान पर जमा होता गया। हालांकि 28 और 29 अप्रैल को तापमान में थोड़ी गिरावट और नमी में वृद्धि के कारण प्रदूषकों के फैलाव में कुछ राहत मिली,लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत खराब श्रेणी की वायु गुणवत्ता बच्चों,बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकती है। सांस संबंधी रोग,आंखों में जलन और हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने स्थिति को सुधारने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं-जंगलों की आग पर त्वरित नियंत्रण के लिए मजबूत तंत्र विकसित किया जाए। कचरा,पत्तियां और कृषि अवशेष जलाने पर सख्त रोक लगाई जाए। आम जनता को वायु गुणवत्ता और उसके प्रभावों के प्रति जागरूक किया जाए। खराब वायु गुणवत्ता के दौरान मास्क का उपयोग और अनावश्यक बाहर निकलने से बचा जाए। वृक्षारोपण और हरित क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जाए। शोध के निष्कर्ष साफ संकेत देते हैं कि श्रीनगर में वायु प्रदूषण एक गंभीर रूप ले चुका है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए,तो यह समस्या आने वाले समय में और विकराल हो सकती है। डॉ.आलोक सागर गौतम और उनकी टीम द्वारा किया गया यह अध्ययन न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है,बल्कि आमजन को जागरूक करने और नीति निर्धारण के लिए भी एक मजबूत आधार प्रस्तुत करता है। अब समय है कि प्रशासन,वैज्ञानिक और आमजन मिलकर इस चुनौती का सामना करें,ताकि गढ़वाल की स्वच्छ वादियों को फिर से स्वच्छ और सुरक्षित बनाया जा सके।

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