श्रीनगर गढ़वाल। मानव जीवन में वाणी केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं,बल्कि चेतना,संयम और आत्मबल का सशक्त माध्यम है। वाणी की शक्ति के संवर्धन की सबसे प्रभावी साधना मौन मानी गई है। जिस प्रकार इंद्रियों के संयम के लिए ब्रह्मचर्य जैसे विधान बताए गए हैं,उसी प्रकार वाणी के संयम हेतु मौन साधना को अनिवार्य माना गया है। अनावश्यक बोलना न केवल ऊर्जा का क्षय करता है,बल्कि मन,विचार और व्यवहार-तीनों को विचलित कर देता है। महात्मा गांधी का यह कथन अत्यंत सारगर्भित है कि मौन सबसे उत्तम भाषण है। यदि बोलना आवश्यक ही हो,तो कम से कम शब्दों में सार कहा जाए। आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिए मौन की आवश्यकता इसलिए भी अधिक है क्योंकि साधना की सबसे बड़ी बाधा साधक की वाचालता होती है। वाचालता विश्वास की शक्ति को क्षीण कर देती है और अंतरात्मा की आवाज को दबा देती है। मौनावस्था में ही आत्मा की वाणी सुनी जा सकती है-वह सूक्ष्म ध्वनि,जो बाहरी कोलाहल में दब जाती है। महावीर स्वामी के जीवन से हमें मौन की महत्ता का गहन बोध मिलता है। उन्होंने वर्षों तक मौन साधना की और तभी अज्ञान के बंधनों से मुक्ति पाई। मौन उस अवस्था का नाम है,जो वाक्य और विचार-दोनों से परे होती है। यह एक शून्य-ध्यान की स्थिति है,जहां अंतर्वाणी स्पष्ट सुनाई देती है और आत्मा का विश्वव्यापी सूक्ष्म शक्ति से साक्षात्कार होता है। जब तक मनुष्य बाहरी शोरगुल में उलझा रहता है, तब तक वह इस सूक्ष्म संबंध को स्थापित नहीं कर सकता। व्यवहारिक जीवन में भी मौन का महत्व कम नहीं है। समाज में कलह,झगड़े,विवाद और संघर्ष का प्रारंभ प्रायः वाणी से ही होता है। एक-दूसरे के लिए कही गई कटु बातें लोगों को उत्तेजित करती हैं,जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। मौन ऐसे अनेक अनर्थों को जन्म लेने से पहले ही रोक देता है। मौन में व्यक्ति दूसरों की बात अधिक ध्यान से सुन पाता है,अपने ज्ञान-कोष को समृद्ध करता है और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम होता है। शास्त्रों में भी तीन प्रकार के पाप बताए गए हैं-वाणी से मन से और कर्म से। इनमें वाणीजन्य पाप सबसे शीघ्र और व्यापक प्रभाव डालते हैं। मौन के अवलंबन से व्यक्ति वाणीजन्य दोषों से बच सकता है और अपने आचरण को शुद्ध बना सकता है। मौन नकारात्मकता को रोकने का कवच है और सकारात्मकता को पुष्ट करने का साधन। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मौन पलायन नहीं,बल्कि आत्मबल का सर्वोच्च स्वरूप है। वाणी का वास्तविक सौंदर्य तभी प्रकट होता है,जब वह मौन के अनुशासन से संस्कारित हो। आज के शोरगुल भरे समय में यदि व्यक्ति मौन की साधना को जीवन का हिस्सा बना ले,तो न केवल उसका आत्मिक विकास संभव है,बल्कि समाज में भी शांति,सहिष्णुता और सद्भाव की स्थापना हो सकती है।








