श्रीनगर गढ़वाल। मां दक्षिण काली के प्रधान सेवक एवं सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक चिंतक डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला ने अपने प्रवचन ग्रन्थावली में कर्मयोग और समर्पण के सौन्दर्य को ईश्वर प्राप्ति का सर्वोच्च मार्ग बताते हुए कहा कि ईश्वर को पाने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग कर वनवासी बनना अथवा दिन-रात केवल पूजा-पाठ का आडंबर रचना आवश्यक नहीं है। सच्ची भक्ति तो कर्तव्य-पालन के साथ बहते पसीने की पवित्रता में निवास करती है। डॉ.चमोला ने कहा कि ईश्वर केवल मंत्रों के उच्चारण में नहीं बल्कि ईमानदारी,सत्यनिष्ठा और पूर्ण समर्पण के साथ किए गए कर्मों में प्रकट होते हैं। यदि मनुष्य अपने दायित्वों का निर्वहन निष्काम भाव से करता है,तो वह स्वयं को जाने या न जाने-परमात्मा के सबसे समीप होता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अपने कर्तव्यों से विमुख होकर किया गया भक्ति का प्रदर्शन परमात्मा की दृष्टि में अपराध के समान है। शास्त्रों का साक्ष्य देते हुए उन्होंने कहा कि कर्म से भागकर की गई पूजा निष्फल होती है,जबकि पूजा मानकर किया गया कर्म ही योग बन जाता है। यही कर्मयोग का वास्तविक स्वरूप है। रामायण का मर्मस्पर्शी प्रसंग: गिलहरी का समर्पण कर्मयोग की महत्ता को समझाते हुए डॉ.चमोला ने रामायण का अत्यंत भावुक और प्रेरक प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि त्रेता युग में लंका विजय और धर्म स्थापना के लिए समुद्र तट पर रामसेतु का निर्माण हो रहा था। महाबली हनुमान,नल-नील और वानर सेना विशाल पर्वत और शिलाएं लाकर सेतु निर्माण में जुटी हुई थी। चारों ओर जय श्रीराम के उद्घोष से दिशाएं गूंज रही थीं। इसी विराट प्रयास के बीच करुणानिधान प्रभु श्रीराम की दृष्टि एक नन्ही गिलहरी पर पड़ी। वह छोटा सा जीव बार-बार समुद्र में डुबकी लगाता,फिर गीले शरीर से रेत में लोटता और सेतु पर जाकर अपने शरीर से चिपकी रेत झाड़ देता। लक्ष्मण ने विस्मय से पूछा भ्राताश्री आप उस क्षुद्र सी गिलहरी को इतनी तन्मयता से क्यों देख रहे हैं। प्रभु श्रीराम ने सजल नेत्रों से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया लक्ष्मण मुझे उसमें केवल एक जीव नहीं,बल्कि कर्तव्य-बोध और पूर्ण समर्पण का शिखर दिखाई दे रहा है। जब गिलहरी से उसके प्रयास का कारण पूछा गया,तो उसने विनम्रता और भाव-विह्वल स्वर में कहा हे प्रभु मेरे पास हनुमान जी जैसी शक्ति नहीं,न वानरों जैसा सामर्थ्य। मेरा शरीर छोटा है,शक्ति सीमित है,पर मेरा समर्पण असीमित है। मैं अपनी क्षमता अनुसार रेत के कण लाकर इस सेतु में योगदान दे रही हूं,ताकि धर्म की विजय में इस दासी का भी एक अंश सम्मिलित रहे। ईश्वर परिणाम नहीं,प्रयास और प्रेम देखते हैं। डॉ.चमोला ने बताया कि यह सुनकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का हृदय द्रवित हो उठा। प्रभु ने प्रेमपूर्वक गिलहरी को अपनी हथेली पर उठाया और वात्सल्य से उसकी पीठ पर उंगलियां फेरीं। मान्यता है कि गिलहरी की पीठ पर बनी तीन धारियां प्रभु राम की उंगलियों के निशान हैं,जो युगों-युगों तक यह संदेश देती रहेंगी कि ईश्वर परिणाम नहीं,बल्कि प्रयास और प्रेम देखते हैं। प्रभु राम के ये वचन आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं-यदि प्रत्येक व्यक्ति इसी निष्काम भाव से अपना कर्तव्य निभाए,तो यह धरती ही स्वर्ग बन जाएगी। कर्तव्य ही सच्ची पूजा डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला ने कहा कि अपने दायित्वों का सही और ईमानदार निर्वहन ही सच्ची ईश्वर-भक्ति है। कार्य छोटा हो या बड़ा,यदि उसके पीछे नीयत शुद्ध है और प्रयास पूर्ण है,तो वही कर्म प्रभु के चरणों में अर्पित पुष्प बन जाता है और वही कर्म सच्ची पूजा कहलाता है। उन्होंने कहा कि आज के भौतिक युग में मानव को कर्मयोग और समर्पण के इस मार्ग को अपनाने की अत्यंत आवश्यकता है। यही मार्ग आत्मशांति,समाज कल्याण और ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित साधन है।








