श्रीनगर गढ़वाल। कन्याकुमारी जहां आस्था समुद्र की लहरों में गूंजती है और तपस्या समय से भी आगे बढ़ जाती है। भारतवर्ष की दक्षिणी धुरी पर स्थित कन्याकुमारी केवल मानचित्र पर अंकित एक भू-खंड नहीं,बल्कि यह नारी शक्ति,त्याग,तप और अधूरी प्रेमकथा की अमर साधना भूमि है। अरब सागर,बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर-तीनों के संगम पर अवस्थित यह दिव्य स्थल ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं प्रकृति ने यहां देवी की आराधना में शीश नवाया हो। युगों-युगों से यह पावन भूमि श्रद्धालुओं,साधकों और यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करती आई है। कन्याकुमारी का हर कण,हर लहर और हर शिला एक ऐसी पौराणिक कथा का साक्ष्य है,जिसमें शक्ति भी है,संयम भी और बलिदान की वह ऊंचाई भी-जहां प्रेम स्वयं धर्म बन जाता है। इस पवित्र स्थान के नामकरण के पीछे एक अत्यंत रोचक और गहन पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि असुर बाणासुर को भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल एक कुंवारी कन्या ही कर सकती है। इस वरदान के कारण बाणासुर अत्यंत अहंकारी और अत्याचारी हो गया। प्राचीन काल में भारत पर शासन करने वाले राजा भरत की आठ पुत्रियां और एक पुत्र थे। उन्होंने अपने विशाल साम्राज्य को नौ समान भागों में बांट दिया। दक्षिण का क्षेत्र उनकी पुत्री कुमारी को प्राप्त हुआ। कुमारी कोई साधारण राजकुमारी नहीं थीं,बल्कि उन्हें आदि शक्ति देवी का अवतार माना जाता था। देवी कुमारी ने दक्षिण भारत के इस भूभाग पर न्यायपूर्ण,धर्मनिष्ठ और कुशल शासन किया। उनका जीवन तपस्या और साधना से ओत-प्रोत था। वे भगवान शिव को अपना पति मानती थीं और उन्हें प्रसन्न करने हेतु कठोर तप करती थीं। देवी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव विवाह के लिए तैयार भी हो गए और विवाह की तैयारियां प्रारंभ हो गई। किन्तु देवर्षि नारद मुनि चाहते थे कि बाणासुर का वध कुंवारी कन्या के हाथों ही हो,जिससे अधर्म का अंत संभव हो सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने लीला रची। जिस रात शिव की बारात को कन्याकुमारी तट पर पहुंचना था,नारद मुनि मुर्गे का रूप धारण कर बांग दे बैठे,जिससे यह भ्रम उत्पन्न हो गया कि प्रातःकाल हो गया है। धर्म के नियमों के अनुसार प्रातःकाल के बाद विवाह संभव नहीं था। परिणामस्वरूप भगवान शिव कन्याकुमारी से लगभग 10 किलोमीटर दूर शुचिन्द्रम नामक स्थान पर रुक गए। इस प्रकार शिव और पार्वती (देवी कुमारी) का विवाह सम्पन्न न हो सका। इसी बीच जब बाणासुर को देवी कुमारी की अनुपम सुंदरता का ज्ञान हुआ,तो उसने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। देवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा-यदि तुम मुझे युद्ध में पराजित कर सको,तभी विवाह संभव है। भीषण युद्ध हुआ और अंततः देवी कुमारी के हाथों बाणासुर का वध हुआ। इस प्रकार देवताओं और मानवता को अत्याचार से मुक्ति मिली। देवी की स्मृति और उनके त्याग के कारण ही इस स्थान का नाम कन्याकुमारी पड़ा। मान्यता है कि शिव-विवाह की तैयारियों में रखा गया गेहूं और चावल कालांतर में समुद्र तट की रंग-बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गया,जो आज भी यहां दिखाई देती है-मानो अधूरी बारात की मूक साक्षी हो। समुद्र के मुहाने पर स्थित यह छोटा किंतु अत्यंत दिव्य मंदिर देवी पार्वती के कन्या स्वरूप को समर्पित है। मंदिर तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर स्थित है। यहां सागर की लहरों का नाद ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वर्गीय संगीत गूंज रहा हो। भक्तगण मंदिर में प्रवेश से पूर्व त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं, जो मंदिर के बाईं ओर लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर का पूर्वी द्वार सदैव बंद रखा जाता है। मान्यता है कि देवी के आभूषणों की दिव्य आभा इतनी प्रखर है कि समुद्र में चलने वाले जहाज उसे लाइटहाउस समझ बैठते थे और दुर्घटनाग्रस्त हो जाते थे। इसी कारण सुरक्षा की दृष्टि से यह द्वार बंद रखा गया। पुराने ग्रंथों के अनुसार कन्याकुमारी हिन्दू धर्म के 51 शक्ति पीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां देवी सती की पीठ (पीठ भाग) गिरी थी और यहां देवी के उसी स्वरूप की पूजा होती है। लोकमान्यता के अनुसार देवी कुमारी आज भी कलियुग के अंत तक भगवान शिव से विवाह की प्रतीक्षा में तपस्यारत हैं। यही कारण है कि यहां देवी की पूजा कन्या स्वरूप में की जाती है-अविवाहित,तेजस्विनी और शक्तिमयी। कन्याकुमारी केवल एक तीर्थस्थल नहीं,बल्कि यह नारी चेतना की वह ज्योति है जो युगों से अखंड प्रज्ज्वलित है। यहां देवी किसी सिंहासन पर नहीं,बल्कि तपस्या के पथ पर खड़ी प्रतीक्षा करती हैं-धैर्य,शक्ति और आत्मसंयम के प्रतीक स्वरूप। आज भी जब कन्याकुमारी के तट पर सूर्य अस्त होता है,तो ऐसा प्रतीत होता है मानो देवी की आंखों में प्रतीक्षा की वही ज्योति झिलमिला उठती हो,जो कलियुग के अंत तक शिव-मिलन की आशा संजोए हुए है। इसी कारण कन्याकुमारी युगों-युगों तक श्रद्धा,विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का जीवंत केंद्र बनी रहेगी जहां आस्था समुद्र से संवाद करती है और तपस्या समय को चुनौती देती है।








