रूद्रप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। जब समाज बेटियों को मैदान से दूर रखने की सोच में उलझा था,तब वर्ष 2003 में रूद्रप्रयाग जनपद के जखोली गांव से एक युवा ने जोखिम उठाकर बदलाव की नींव रख दी। यह कहानी है देवेन्द्र गौड़ की-जिन्होंने सामाजिक तानों,विरोध और गालियों की परवाह किए बिना गांव की बहू-बेटियों को क्रिकेट के मैदान तक पहुंचाया। शुरुआत आसान नहीं थी। गांव के कई बड़े-बुजुर्गों को महिलाओं का खेलों में उतरना स्वीकार नहीं था। हालात इतने कठिन हो गए कि देवेन्द्र गौड़ के बड़े भाई और भाभी को भी समाज के दबाव में उन्हें सख्त हिदायत देनी पड़ी कि किसी की बहू-बेटी को खेलने के लिए न कहें। पर बदलाव की आग मन में जल चुकी थी। कुछ समय की चुप्पी के बाद वर्ष 2009 में देवेन्द्र गौड़ ने फिर हिम्मत दिखाई और जोखिम उठाकर बेटियों के हाथों में गेंद और बल्ला थमा दिया। खेतों की मेड़ से मैदान तक बदली नजर जिस समाज ने कभी ताने मारे थे,वही लोग धीरे-धीरे खेतों की मेड़ पर खड़े होकर बालिकाओं के मैच देखने लगे। क्रिकेट का रोमांच बढ़ा,आत्मविश्वास जगा और शाम ढलते ही बेटियां खुलकर मैदान में उतरने लगीं। यही नहीं अभिभावकों की सोच भी बदलने लगी। पिता की स्मृति से खेल आंदोलन देवेन्द्र गौड़ ने अपने पिताजी स्वर्गीय जगतराम गौड़ की पुण्यतिथि पर “माध्यमिक वर्ग बालिका क्रिकेट” की शुरुआत की। यह आयोजन हर वर्ष 27 व 28 अगस्त को बड़े स्तर पर होने लगा। जब देश में 29 अगस्त को हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की स्मृति में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाने लगा,तब इस पहल को और विस्तार मिला। तब से हर साल 27,28 और 29 अगस्त को तीन दिवसीय माध्यमिक वर्ग बालिका क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन निरंतर किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची बेटियां इस आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतिफल यह रहा कि यहां से खेलकर निकली तीन बालिकाओं का चयन राष्ट्रीय स्तर पर हुआ। इनमें दो छात्राएं राजकीय इंटर कॉलेज धद्दी घंडियाल (बढ़ियारगढ़़) की कक्षा 9 व 11 की हैं,जबकि एक छात्रा राजकीय इंटर कॉलेज भल्लेगांव-बागवान से है। यह उपलब्धि न केवल खिलाड़ियों की है,बल्कि उस सोच की जीत है जिसने बेटियों को मैदान का हक दिलाया। “खेलेगी मां तो सीखेंगे बच्चे” देवेन्द्र गौड़ का मानना है कि केवल पढ़ाई पर जोर देने से न तो शारीरिक विकास होता है और न ही मानसिक। इसी सोच के साथ उन्होंने वर्ष 2012 में नारा दिया “खेलेगी मां तो सीखेंगे बच्चे।” उनका कहना है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने से मानसिक तनाव कम होता है और परिवार में सकारात्मक माहौल बनता है। आज इसी सोच का परिणाम है कि 30 वर्ष की आयु पार कर चुकी महिलाएं भी शाम के समय अपने बच्चों के साथ मैदान में खेलती नजर आती हैं। यह दृश्य मोबाइल की दुनिया से कुछ देर की मुक्ति और सेहत की ओर लौटने का संदेश देता है। दो दर्जन से अधिक टीमें,38-38 की महिला भागीदारी वर्तमान में इस टूर्नामेंट में दो दर्जन से अधिक टीमें भाग लेने की इच्छा जताती हैं। इतना ही नहीं,उम्रदराज मातृशक्ति की 38-38 टीमें भी विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। एक व्यक्ति,एक सोच,एक क्रांति
देवेन्द्र गौड़ की यह पहल केवल क्रिकेट टूर्नामेंट नहीं,बल्कि ग्रामीण समाज में बेटियों के सशक्तिकरण की एक जीवंत क्रांति बन चुकी है। यह कहानी बताती है कि यदि नीयत साफ और इरादे मजबूत हों,तो गांव की गालियां भी एक दिन तालियों में बदल जाती हैं।








