श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर आयोजित संगोष्ठी में विद्वानों ने शिक्षा की वर्तमान संरचना को भारतीय चिंतन से समृद्ध करने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम के समन्वयक डॉ.अमरजीत परिहार ने अपने विस्तृत और विचारोत्तेजक संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल एक वैकल्पिक विषय के रूप में सीमित करना उचित नहीं,बल्कि इसे सभी शैक्षणिक विषयों के साथ समन्वित रूप में समझना और पढ़ाना समय की मांग है। डॉ.परिहार ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली अनुभव,अवलोकन और प्रकृति के साथ संतुलित सहअस्तित्व पर आधारित रही है। इसमें जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों का समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार तक सीमित न रहकर जीवन-मूल्यों,पर्यावरण चेतना और नैतिक दृष्टि का विकास करना है,तो भारतीय ज्ञान परम्परा को शिक्षा की मुख्यधारा में लाना अनिवार्य है। कार्यक्रम में वक्ताओं का स्वागत करते हुए एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो.डी.एस.नेगी ने बताया कि विश्वविद्यालय स्तर पर विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान के आयामों को समाहित करने की दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य से विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है,ताकि परंपरा और आधुनिकता के बीच सार्थक सेतु स्थापित किया जा सके। द्वितीय सत्र में प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता प्रो.मोहन पंवार ने भारतीय ग्रंथों में निहित भौगोलिक ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऋग्वेद में नदियों और पर्वतों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो उस काल की पर्यावरणीय समझ को दर्शाता है। पृथ्वी सूक्त में जलवायु,वातावरण,ग्रहण और भूकम्प जैसी प्राकृतिक घटनाओं का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारत में वैज्ञानिक दृष्टि विकसित थी। उन्होंने कहा कि संहिताकाल और उपनिषद काल में भी भूगोल संबंधी चिंतन परिपक्व रूप में विद्यमान था। प्रो.पंवार ने भारतीय ज्ञान परम्परा को विश्व की प्राचीनतम ज्ञान प्रणालियों में से एक बताते हुए कहा कि हिमालय क्षेत्र स्वयं में एक जीवंत ज्ञान परंपरा का धनी रहा है। आज जब पर्यावरण संकट और जलवायु परिवर्तन वैश्विक चिंता का विषय हैं,तब हिमालयी ज्ञान की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। इस अवसर पर राजकीय पीजी कॉलेज हरिपुर हिमाचल प्रदेश के डॉ.दिनेश कुमार शर्मा ने कृषि आधारित भारतीय ज्ञान परम्परा पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि प्रणाली केवल उत्पादन का माध्यम नहीं रही,बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित और टिकाऊ जीवन-पद्धति का आधार रही है। पारंपरिक कृषि ज्ञान में जल संरक्षण,जैव विविधता और ऋतुचक्र की गहरी समझ समाहित है,जो आज के सतत विकास की अवधारणा से मेल खाती है। कार्यक्रम का संचालन डॉ.विकास चौबे एवं शोधार्थी अपराजिता घिल्डियाल ने संयुक्त रूप से किया। संगोष्ठी में शिक्षकों,शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही। विचार-विमर्श के दौरान प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि भारतीय ज्ञान परम्परा को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ना केवल सांस्कृतिक पुनर्स्मरण नहीं,बल्कि भविष्य की सुदृढ़ और संतुलित शैक्षिक व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब परंपरा और आधुनिकता का समन्वय होगा,तभी शिक्षा वास्तविक अर्थों में समग्र,मानवीय और समाजोपयोगी बन सकेगी।






